शील: शास्त्र और सितारे
Sunday, May 13, 2012
अभी नहीं होगा महाप्रलय
Wednesday, April 11, 2012
नव सम्वत्सर 2069
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा, शुक्रवार तदनुसार 23 मार्च,2012 को रात्रि में 8 बजकर 7 मिनट पर विश्वावसु सम्वत्सर का प्रवेश उत्तराभाद्रपद नक्षत्र एवम् शुक्ल योगकालीन कन्या लग्न में प्रविष्ट हो रहा है। सम्वत् 2069 का वर्षप्रवेश लग्न कन्या है। वर्ष लग्नेश बुध अस्तंगत होकर सप्तम भाव में अपनी नीच राशि मीन में मंगल की आठवीं अशुभ दृष्टि से आक्रान्त है और वर्ष लग्न भी दो पाप ग्रहों, शनि और मंगल के बीच पापाक्रान्त है, पापकर्तरी योग बना रहा है। अन्ताराष्ट्रीय सम्बन्धों का स्वामी सप्तमेश गुरू अष्टम भाव में शत्रुग्रह शुक्र के साथ बैठा है। अतः पृथ्वी अनेक प्रकार के उपद्रवों और घोर रोगों से आकुल दिखेगी।
पूर्वी प्रान्तों (बंग, उत्कल, बिहार), मध्य (छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश) तथा उत्तरी भाग में हिंसक उपद्रव, राजनैतिक विग्रह और सीमावर्ती प्रदेशों में अग्निकाण्ड, सत्ता-परिवर्तन और विदेशी अतिक्रमणों से देश जूझता दिखेगा। राजनेताओं और मन्त्रियों में परस्पर विद्वेष एवम् तनाव चरम पर दिखेगा। किसी प्रतिष्ठित विभूति के निधन से देश मर्माहत हो सकता है। पश्चिमतटीय भागों तथा उत्तरी-पर्वतीय हिस्सों में अतिवृष्टि, भूस्खलन, भूकम्प जैसे प्राकृतिक प्रकोप दिखेंगे। अर्थात् राजनेता, प्रशासनिक अधिकारी और लोकमानस के साथ-साथ प्रकृति भी क्षुब्ध और कुपित दिखेगी।
अब्देविश्वावसौ शश्वद् घोररोगाकुलाधराः।
सस्यार्घवृष्टयोमध्याभूपालानातिभूतयः।।
कन्यायाम् दक्षिणेदेशे-मरिस्यात् तथा बंगेप्युपद्रवः।
लोकदुखं पश्चिमायां विग्रहः अन्न समर्घता।।
............ प्राच्यामुदीच्याम् राज-विग्रहः।
मध्यदेशे छत्र भंगः समर्घत्वं घृते पुनः।।
चान्दी, दूध और दूध से बने उत्पाद( घी, पनीर), जीवनरक्षक दवाएँ, तेल, पेट्रोलियम पदार्थों के साथ-साथ धान्यादि के मूल्य आसमान चूमेंगे। अनुकूल वर्षा में कमी, कमरतोड़ महँगाई, क्लिष्ट रोगों की अधिकता, हिंसक उपद्रव और अभावों से जनजीवन हलकान रहेगा। शासक वर्ग परस्पर विद्वेष लोभ और अहंकारवश राजधर्म से विमुख होगा।
बावजूद इन सबके भारतवर्ष इंजीनियरिंग, कम्प्युटर, दूरसंचार, उच्च-तकनीकि शिक्षा, अन्ताराष्ट्रीय निर्यात आदि क्षेत्रों में आशातीत सफलता प्राप्त करेगा। अमेरिका, जापान, ब्रिटेन, जर्मनी के साथ सोवियत रूस से सम्बन्धों में प्रगाढ़ता आएगी।
खप्पर योग— 7 अप्रैल से 3 जुलाई तक वैशाख, ज्येष्ठ, आषाढ़ महीनों में क्रमशः 5 शनिवार, 5 रविवार और 5 मंगलवार पड़ने से अत्यंत अनिष्टकारी खप्पर योग बन रहा है।
शनिः स्यात् आद्यसंक्रान्तौ द्वितीयायाम् प्रभाकरः।
तृतीयायाम् कुजो योगः खर्पराखयोति कष्टकृत्।।
साथ ही वर्ष के प्रारम्भ से ही शुभ ग्रहों (बुध और गुरू) का अतिचारी होना और शनि का वक्री होना विश्व के लिए हाहाकारी समय का सूचक है।
अतिचार गते जीवे वक्री भूते शनैश्चरे।
हा! हा! भूतं जगत् सर्वम् रूण्डमाला महीतले।।
मेष और तुला राशियों पर गुरू और शनि का समसप्तक योग, वर्षलग्नेश बुध का वर्ष और जगत् लग्न- दोनों कुण्डलियों में नीच का होकर क्रमशः सातवें और छठे भाव में बैठना, जगत् लग्नाधिपति शुक्र का केतु के साथ आठवें भाव में जाना जाड़े में हिमपात की तरह होगा, जब कि इस वर्ष शुक्र को वर्ष के राजा और मंत्री दोनों का अधिकार प्राप्त है।
सम्पूर्ण विश्व में प्राकृतिक प्रकोप अपने चरम पर होंगे, स्त्रियों पर अत्याचार और यौन अपराधों के साथ ही यौन उत्श्रृंखलता और यौन रोगों, मधुमेह, कैंसर आदि में वृद्धि होगी, शासक वर्ग के प्रति भयंकर असंतोष और विद्रोह के लक्षण भी दिख रहे हैं। सरकारी तंत्र आपसी ताल-मेल से हीन होंगे, आकस्मिक दुर्घटनाओं, जानलेवा विस्फोटकों, जबर्दस्त महँगाई तथा चरमराते आर्थिक हालात से भारत ही नहीं अपितु सम्पूर्ण विश्व हलकान होगा।
स्वयं राजा स्वयं मंत्री जनेषु रोग पीड़ा विग्रह भयं च नृपाणाम्।।
ईश्वर के प्रति भयवश श्रद्धा का दिखावा अतिरेक की हद तक होगा। यह सच्चे मन से ईश्वर को गुहार लगाने का समय है। ईश्वर हमें सद्बुद्धि और विवेक दें।
Monday, September 26, 2011
नमो देव्यै महादेव्यै....
मनुष्यो मत्प्रसादेन भविष्यति न संशय:॥( मनुष्य मेरे प्रसाद से सब बाधाओं से मुक्त तथा धन-धान्य एवं पुत्र से सम्पन्न होगा इसमें तनिक भी संदेह नहीं है।) अ.4,श्लो.17
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥( नारायणी, तुम सब प्रकार का मङ्गल प्रदान करनेवाली मङ्गलमयी हो। कल्याणदायिनी शिवा हो। सब पुरुषार्थो को सिद्ध करनेवाली, शरणागतवत्सला, तीन नेत्रोंवाली एवं गौरी हो तुम्हें नमस्कार है) अ.4,श्लो.17
दुर्गे स्मृता हरसि भीतिमशेषजन्तो:
स्वस्थै: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि।
दारिद्र्यदु:खभयहारिणि का त्वदन्या
सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता॥( माँ दुर्गे, आप स्मरण करने पर सब प्राणियों का भय हर लेती हैं और स्वस्थ पुरषों द्वारा चिन्तन करने पर उन्हें परम कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं। दु:ख, दरिद्रता और भय हरनेवाली देवि, आपके सिवा दूसरी कौन है, जिसका चित्त सबका उपकार करने के लिये सदा ही दयार्द्र रहता हो।)(अ.4,श्लो.17)
त्वयैकया पूरितमम्बयैतत् का ते स्तुति: स्तव्यपरा परोक्तिः॥ ( देवि, सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारे ही भिन्न-भिन्न स्वरूप हैं। जगत् में जितनी स्त्रियाँ हैं, वे सब तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं। जगदम्ब, एकमात्र तुमने ही इस विश्व को व्याप्त कर रखा है। तुम्हारी स्तुति क्या हो सकती है, तुम तो स्तवन करने योग्य पदार्थो से परे एवं परा वाणी हो।) (अ.11, श्लो.6)
ततस्तौ नाशयिष्यामि विन्ध्याचलनिवासिनी।। (अ.11, श्लो.42)
शूलेन पाहि नो देवि पाहि खड्गेन चाम्बिके।
घण्टास्वनेन न: पाहि चापज्यानि:स्वनेन च॥( देवि! आप शूल से हमारी रक्षा करें। अम्बिके! आप खड्ग से भी हमारी रक्षा करें तथा घण्टा की ध्वनि और धनुष की टंकार से भी हमलोगों की रक्षा करें।)(अ.4,श्लो.24)
एवमेव त्वया कार्यमस्मद्वैरिविनाशनम्॥( सर्वेश्वरि! तुम इसी प्रकार तीनों लोकों की समस्त बाधाओं को शान्त करो और हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो।)(अ.11, श्लो.38)
तारिणीं दुर्गसंसारसागरस्य कुलोद्भवाम्॥( मन की इच्छा के अनुसार चलनेवाली मनोहर पत्नी प्रदान करो, जो दुर्गम संसारसागर से तारनेवाली तथा उत्तम कुल में उत्पन्न हुई हो।)(अर्गला,श्लो.24)
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥( मुझे सौभाग्य और आरोग्य दो। परम सुख दो, रूप दो, जय दो, यश दो और काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाश करो।)(अर्गला,श्लो.12)
त्वामाश्रितानां न विपन्नराणां त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति॥( देवि, तुम प्रसन्न होने पर सब रोगों को नष्ट कर देती हो और कुपित होने पर मनोवाञ्छित सभी कामनाओं का नाश कर देती हो। जो लोग तुम्हारी शरण में जा चुके हैं, उन पर विपत्ति तो आती ही नहीं। तुम्हारी शरण में गये हुए मनुष्य दूसरों को शरण देनेवाले हो जाते हैं।)(अ.11, श्लो.29)
निश्शेषदेवगणशक्ति समूहमूर्त्या।
तामम्बिकामखिलदेवमहर्षिपूज्यां
भक्त्या नता: स्म विदधातु शुभानि सा न:॥( सम्पूर्ण देवताओं की शक्ति का समुदाय ही जिनका स्वरूप है तथा जिन देवी ने अपनी शक्ति से सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त कर रखा है, समस्त देवताओं और महर्षियों की पूजनीया उन जगदम्बा को हम भक्ति पूर्वक नमस्कार करते हैं। वे हमलोगों का कल्याण करें।)